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रासायनिक कीटनाशक

अब खेतों में कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ेगी, अपनाएं यह आधुनिक तरीका

अब खेतों में कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ेगी, अपनाएं यह आधुनिक तरीका

खेती-बाड़ी में कीट पतंगों को भगाने के लिए हमेशा से किसानों की तरफ से कीटनाशक या फिर केमिकल युक्त रसायनों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन आजकल लोग अपनी सेहत को लेकर बेहद जागरूक हो गए हैं और वह खाने-पीने में ऐसी चीजें इस्तेमाल करना चाहते हैं। जिन पर किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल ना किया गया हो। ऐसे में किसानों की समस्या थोड़ी बढ़ गई है। क्योंकि अगर वह किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। तो फसल को कीट पतंगों से नुकसान होने का खतरा रहता है। कभी-कभी पूरी की पूरी फसल भी बर्बाद हो जाती हैं। ऐसे में किसानों के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है, कि किस तरह से फसल की इन कीटों से रक्षा की जाए। हाल ही में किसानों की समस्या का हल करने के लिए कई तरह के विकल्प दिए गए हैं। इन्हीं विकल्पों में से एक है लाइट ट्रैप जो फसल को बिना नुकसान पहुंचाए सारे कीटों को नष्ट कर देता है। ये कीटनाशकों का एक अच्छा विकल्प है, जिसे किसानों तक पहुंचाने के लिए सरकार कई योजनाएं और जागरूकता कार्यक्रम भी चलाती है। इसी कड़ी में हरियाणा सरकार भी किसानों को लाइट ट्रैप लगवाने के लिए प्रेरित कर रही है। लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करने के लिए किसानों के खेत में सोलर LED लाइट लगवाए जाते हैं, जो सूरज की रोशनी से ही चार्ज हो जाते हैं। कृषि विभाग की ओर से किसानों को सोलर LED लाइट ट्रैप की खरीद पर 75 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है।
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क्या है सोलर LED लाइट ट्रैप

आपको बता दें कि सोलर LED लाइट ट्रैप एक सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण है। इस उपकरण में सबसे ऊपर सोलर प्लेट लगी होती है, जिसके नीचे लगी बैटरी को दिन के समय चार्ज किया जाता है। इस उपकरण में एक इलैक्ट्रिक रैकिट भी लगा होता है, जिसके ऊपर कई छोटे-छोटे बल्ब भी लगा दिए जाते हैं। ये बल्ब सौर ऊर्जा से चार्ज बैटरी से जलते हैं। इसकी रौशनी में रात के समय कीट आकर्षित होते हैं और इलैक्ट्रिक रैकिट की चपेट में आकर नष्ट हो जाते हैं। इस तरह फसल को भी नुकसान नहीं होता और बिना किसी छिड़काव के कीटों का नियंत्रण भी हो जाता है।
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सरकार की तरफ से मिल रही है सब्सिडी

सरकार की तरफ से सब्सिडी की बात की जाए तो किसानों को सोलर LED लाइट स्ट्रिप लगाने के लिए हरियाणा सरकार लगभग 75% तक की सब्सिडी दे रही है। हर एक एकड़ में एक सोलर पावर एलईडी लाइट ट्रैप लगाया जाता है और कोई भी किसान अधिकतम 10 एकड़ में लाइट ट्रैप लगा सकता है। साथ ही इस योजना के तहत सबसे अच्छी बात है, कि इस स्कीम के तहत लाभ उठाने के लिए आप आवेदन ऑनलाइन पोर्टल 'मेरी फसल मेरा ब्यौरा' पर ही दे सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी सीएससी सेंटर में जाकर भी आवेदन करवा सकते हैं।

सब्जी और नकदी फसलों को होता है कीटों से सबसे ज्यादा नुकसान

राज्य सरकार की जिला बागवानी अधिकारी डॉ. नेहा यादव से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि जैसे ही मौसम बदलने लगता है, तो सब्जियों और दूसरी नकदी फसलों को कीट पतंगों से होने वाला नुकसान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे में इन कीट पतंगों की रोकथाम ना की जाए तो यह पूरी की पूरी फसल को भी बर्बाद कर सकते हैं। ऐसे में किसान इन को मारने के लिए या फिर भगाने के लिए केमिकल युक्त हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इनसे सबसे बड़ी समस्या जो सामने आती है, वह है कि इनका कुछ ना कुछ अंश सब्जियों या फलों पर रह जाता है। जो आगे चलकर इसको इस्तेमाल करने वाले लोगों की सेहत पर गलत असर करता है। साथ ही, बिना जानकारी के इस्तेमाल किए जाने पर यह रासायनिक कीटनाशक फसल को भी बर्बाद कर देते हैं। इन सभी कारणों के चलते ही हरियाणा सरकार कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए सोलर एलइडी लाइट ट्रैप का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह किसानों को दे रही है। अलग-अलग योजनाएं बनाकर उन्हें इसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इस राज्य में किसान कीटनाशक और उर्वरक की जगह देशी दारू का छिड़काव कर रहे हैं

इस राज्य में किसान कीटनाशक और उर्वरक की जगह देशी दारू का छिड़काव कर रहे हैं

किसान पंकज का कहना है, कि एक एकड़ भूमि में 500 एमएल देसी शराब का छिड़काव किया जाता है। इससे फसलीय उत्पादन में वृद्धि होने की बात कही जा रही है। ऐसे तो किसान बेहतरीन उत्पादन के लिए खेतों में उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। परंतु, मध्य प्रदेश के कुछ किसान पैदावार बढ़ाने के लिए अजीबोगरीब तरीका अपना रहे हैं। जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। यहां के किसान दलहन के उत्पादन में बढ़ोत्तरी करने के लिए फसलों को देसी शराब पिला रहे हैं। हालांकि, इससे फसलों को कोई हानि नहीं पहुंचने का दावा किया जा रहा है। किसानों का यह मानना है, कि ऐसा करने से दलहन की पैदावार बढ़ जाती है।

इस जनपद के किसान फसल को पिला रहे देशी दारू

मीडिया के अनुसार, नर्मदापुरम जनपद में किसानों ने ग्रीष्मकालीन
मूंग की खेती की है। यहां पर किसान मूंग की दोगुनी पैदावार लेने के लिए फसल पर देसी दारू का छिड़काव कर रहे हैं। किसानों का यह भी कहना है, कि इंसान की भांति पौधे भी दारू पीते हैं। इससे फसलों का उत्पादन बढ़ जाता है। कहा जा रहा है, कि नर्मदापुरम के अतिरिक्त अन्य दूसरे जनपदों में भी किसान खेती की इस विधि को अपना रहे हैं। किसानों का कहना है, कि आगामी दिनों में पूरे राज्य में मूंग की फसल को देसी दारू पिलाने का चलन चालू हो जाएगा। इससे राज्य में मूंग का उत्पादन बढ़ जाएगा।

किसानों ने देसी दारू के छिड़काव को लेकर क्या कहा है

दरअसल, जनपद के किसान देसी दारू को कीटनाशक के तौर पर फसलों के ऊपर छिड़काव करते हैं। किसानों ने कहा है, कि देसी दारू को पानी में मिलाकर स्प्रे मशीन के जरिए से फसल पर छिड़काव किया जाता है। इससे कीट- पतंग भी मर जाते हैं। किसानों के मुताबिक, रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करने से हम लोगों की सेहत पर भी प्रभाव पड़ता था। कीटनाशक का छिड़काव करने वाले इंसान की आंखों में तेज जलन होने लगती है। इतना ही नहीं सिर में भी काफी दर्द होता है। बहुत बार तो यह भी देखा गया है, कि किसान बीमार भी पड़ जाते हैं। परंतु, देसी दारू के साथ इस प्रकार की कोई दिक्कत नहीं है।

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वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक केके मिश्रा का शराब छिड़काव पर क्या कहना है

जानकारी के लिए बतादें, कि कुछ स्थानीय किसानों का ऐसा मानना है, कि देसी दारू एक प्रकार से जैविक दवा है। यह रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में काफी सस्ती भी होती है। ऐसे में किसानों की खेती पर होने वाली लागत कम हो जाती है। स्थानीय किसान पंकज ने कहा है, कि एक एकड़ जमीन पर 500 एमएल देसी शराब का छिड़काव किया जाता है। 20 लीटर जल में 100 एमएल देसी शराब का मिश्रण करके पौधों के ऊपर छिड़काव किया जाता है। साथ ही, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक केके मिश्रा ने कहा है, कि ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल में शराब का छिड़काव करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इससे फसल को किसी तरह का कोई लाभ भी नहीं होने वाला है, बल्कि साइड इफेक्ट ही हो सकता है। ऐसी स्थिति में फसलों की पैदावार में इजाफा होने की जगह गिरावट हो सकती है।
कीटनाशक कितना खतरनाक है, इसका पता हम रंग से भी लगा सकते हैं

कीटनाशक कितना खतरनाक है, इसका पता हम रंग से भी लगा सकते हैं

जैसा कि हम सब जानते हैं, कि कीटों का खत्मा करने के लिए किसान खेतों में कीटनाशक का इस्तेमाल किया करते है। साथ ही, इसकी पैकेट पर प्रदर्शित रंगों से इसकी तीव्रता का पता चल जाता है। इनमें लाल रंग सर्वाधिक तीव्रता वाला होता है। खेती से उत्तम उत्पादन पाने के लिए जितनी आवश्यक मृदा है, उतनी ही आवश्यक जलवायु भी होती है। बीज का उत्तम होना भी काफी महत्वपूर्ण होता है। 

साथ ही, फसल का कीटों से संरक्षण करने के लिए उत्तम कीटनाशक का चुनाव अत्यंत आवश्यक होता है। बाजार में सैंकड़ों की तादात में कीटनाशक विघमान होते हैं। इनका समुचित चयन काफी जरूरी होता है। परंतु, कौन सा कीटनाशक बेहतरीन ढंग से कार्य करता है। इसका चयन किस प्रकार से किया जाए। कहा जाता है, कि कीटनाशकों के ज्यादा खतरनाक होने की जानकारी रंगोें के जरिए से भी की जा सकती है। यह रंग कीटनाशकों के पैकेट पर भी लगा हुआ होता है।

किस कीटनाशक से कितना खतरनाक

लाल रंग निशान वाले कीटनाशक सबसे खतरनाक होते हैं

लाल रंग खतरे का निशान माना जाता है। रंगों के संबंध में भी कुछ ऐसा ही है। लाल रंग जहर की तीव्रता को नापने वाले पैमाने पर सबसे ज्यादा होता है। अब अगर किसी कीटनाशक के पैकेट के पीछे लाल रंग का लोगो है, तो यह सबसे तीव्र कीटनाशक रसायन के रूप में माना जाता है।

पीला रंग दूसरे स्तर पर खतरनाक कीटनाशक माना जाता है

लाल रंग के उपरांत पीले रंग को खतरनाक स्तर के मामले में दूसरे स्तर का कीटनाशक माना जाता है। खेत में इसका कितना इस्तेमाल किए जाना चाहिए। इसके पैकेट पर लिखा हुआ होता है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों से इसकी सलाह भी ली जा सकती है। 

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नीला रंग वाले मध्यम स्तर की तीव्रता रखते हैं

कीटनाशक के पैकेट का रंग यदि नीला होता है। उसकी तीव्रता मध्यम स्तर पर होती है। मतलब साफ है, कि यह लाल एवं पीले रंग से कुछ कम खतरनाक होता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. विवेक राज का कहना है, कि हर फसल में भिन्न-भिन्न प्रकार के कीट लगते हैं। उनकी तीव्रता भी ज्यादा और कम हो सकती है। इसी तीव्रता के आधार पर किसानों को कीटनाशक इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। उन्होंने कहा है, कि कोई भी किसान खेत में कीटनाशक इस्तेमाल करने से पूर्व कृषि एक्सपर्ट से सलाह जरूर प्राप्त करे। 

हरा रंग वाले कीटनाशकों में न्यूनतम स्तर की तीव्रता होती है

जिस पैकेट का रंग हरा होता है, उसकी तीव्रता न्यूनतम होती है। ऐसे मेें खेती मेें कम कीटनाशक होने अथवा फिर कीटनाशक के खतरे को देखते हुए इस प्रकार के कीटनाशकों के उपयोग की सलाह प्रदान की जाती है। अधिकांश किसानों को कीटनाशकों के खतरनाक होने के स्तर की जानकारी नहीं होती है। इसके चलते उनके साथ दुर्घटना होने की संभावना भी होती है।

रासायनिक कीटनाशकों को छोड़ नीम के प्रयोग से करें जैविक खेती

रासायनिक कीटनाशकों को छोड़ नीम के प्रयोग से करें जैविक खेती

आजकल कीटनाशक असली है या नकली ये कहना बहुत कठिन हो गया है, कई बार रासायनिक कीटनाशक फसल पर प्रतिकूल प्रभाव भी डालते हैं। किसान कम कीमत में कीटनाशक खरीदने के चक्कर में रसीद ही नहीं लेते, क्योंकि वह १८ % जी एस टी (GST) से बच जाते हैं और इस वजह से उनको घटिया किस्म के कीटनाशक पकड़ा दिए जाते हैं। नकली रासायनिक कीटनाशकों को छोड़कर, स्वयं नीम(Neem) के प्रयोग से कीटनाशक बनाने का प्रयास करें। नकली रासायनिक कीटनाशक भूमि और फसल को काफी हद तक दूषित और जहरीली बना देते हैं।

फसल को प्राकृतिक रूप से पैदा करने से, खाने वाले का स्वास्थ्य और मन दोनों स्वस्थ और मस्त रहता है, क्योंकि प्राकृतिक खेती करने से फसल में जहरीले रासायनिक कीटनाशकों व उर्वरकों का लेश मात्र भी मिश्रण नहीं होता। नीम के प्रयोग से किसान खुद अपने घर खेत पर ही कीटनाशक तैयार कर सकते हैं, जो कि रासायनिक कीटनाशकों की जगह एक अच्छे विकल्प की भूमिका अदा करेगा। नीम द्वारा बनाई गयी कीटनाशक दवा का फसल में छिड़काव करके किसान अपनी फसल की कीटों से सुरक्षा कर सकते हैं।

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नीम से कीटनाशक बनाने के क्या फायदे हैं ?

नीम से कीटनाशक बनाकर किसान कीटनाशकों पर किये जाने वाले अधिक खर्च से बच सकते हैं। किसान दूषित खानपान को रोकने के लिए ऑर्गेनिक और जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। जैविक एवं आर्गेनिक खेती की चर्चा आज पूरे देशभर में चल रही है, क्योंकि इसमें किसानों की कम लागत लगने के साथ साथ फसल भी उत्तम गुणवत्ता के साथ होती है, जिसे खाने से लोगों को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होता। जबकि रासायनिक तरीके से उत्पन्न की जाने वाली फसल में अच्छे बुरे केमिकल्स मिले हुए होते हैं, जो कि काफी हद तक सेहत को खराब करने में सक्षम होते हैं। इसलिए नीम से बनायीं गयी कीटनाशक दवाओं का ही छिड़काव किया जाना चाहिए। नीम से निर्मित कीटनाशक दवा बहुत ही उम्दा और शुद्ध होती है।

घर बैठे किस प्रकार तैयार करें जैविक कीटनाशक

जैविक कीटनाशक घर पर तैयार करने के लिए नीम का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है, नीम के अंदर बहुत सारे गुण विघमान होते हैं। नीम में जीवाणुरोधी एंटी कार्सिनोजेनिक एवं एंटीफंगल जैसी विशेषताएं कीटनाशक बनाने के लिए बहुत सहायक साबित होती हैं। साथ ही नीम के तेल का निचोड़ भी कीटनाशक प्रतिरोधी अवयवों से उत्पन्न हुआ है, जिसकी दुर्गंध एवं कड़वेपन की वजह से यह फसलों को कीट व कीड़ों से बचाने की क्षमता रखता है।

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नीम का कीटनाशक घर पर तैयार करने की विधि :

नीम का कीटनाशक बनाने के लिए :

  • हरी मिर्च और लहसुन को अच्छी तरह से पीस कर, अच्छी तरह मिश्रण करने के उपरांत उबले हुए चावल के जल में डालदें।
  • मिश्रण के बाद कम से कम २४ घंटे के लिए किसी अच्छे स्थान पर रखें,
  • उसके बाद इसको लहसुन और हरी मिर्च वाले जल में सही तरीके से मिलाकर, मिर्च और लहसुन के छिलकों को छानकर बाहर निकालदें।
  • तीन चार चम्मच नीम के तेल के अर्क को मिश्रित करने के बाद, एक बोतल पानी में मिलाकर पतला करें,
  • मिश्रण को कीट व रोगों से ग्रसित पौधों पर छिड़कें।

फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग करते समय बरतें सावधानी, हो सकता है भारी नुकसान

फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग करते समय बरतें सावधानी, हो सकता है भारी नुकसान

फसलों पर कीटों का हमला होना आम बात है। इसलिए लोग पिछली कई शताब्दियों से कीटों से छुटकारा पाने के लिए फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग करते आ रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से देखा गया है कि किसानों ने रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ा दिया है। साथ ही जैविक कीटनाशकों का प्रयोग तेजी से कम हुआ है। बाजार में उपलब्ध सभी कीटनाशकों को प्रमाणिकताओं के आधार पर बाजार में बेंचा जा रहा है, इसके बावजूद रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से फसलों को नुकसान होता है और किसान इससे बुरी तरह से प्रभावित होते हैं।

फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग

इन दिनों बाजार में विभिन्न तरह के कीटनाशक उपलब्ध हैं। लेकिन इनको खरीदने के पहले किसान को पूरी जानकारी होना आवश्यक कि वो किस कीटनाशक को खरीद रहे हैं और वह रोग को खत्म करने में सहायक होगा या नहीं। वैसे आजकल बाजार में ऐसे कीटनाशी भी आ रहे हैं जिनका प्रयोग अलग-अलग फसल के लिए भी कर सकते हैं। इससे फसल को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा। सरकार ने कुछ कीटनाशकों को कुछ फसलों के लिए निर्धारित किया है। इन चुनी गई फसलों में विशेष कीटनाशक ही डाले जा सकते हैं।

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कई बार देखा गया कि कीटनाशकों के कारण फसलें नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हैं। इसलिए सरकार ने कुछ कीटनाशकों को बाजार में बेंचने से प्रतिबंधित कर दिया है। इनमें मालाथयॉन कीटनाशक प्रमुख है। इसका उपयोग ज्वार, मटर, सोयाबीन, अरंडी, सूरजमुखी, भिंडी, बैगन, फूलगोभी, मूली की खेती में किया जाता था। इसके अलावा क्युनलफोस और मैनकोजेब को प्रबंधित किया जा चुका है। इन दोनों कीटनाशकों का उपयोग जूट, इलायची, ज्वार, अमरुद और ज्वार की फसल में किया जाता था। 

सरकार ने फसलों के ऊपर खतरे को देखते हुए अक्सिफलोरफेन और क्लोरप्यरिफोस को भी प्रतिबंधित कर दिया है। इनका प्रयोग आलू, मूंगफली, बेर, साइट्रस और तंबाकू की फसलों में किया जाता था। कई बार ये कीटनाशक फसलों के साथ-साथ आम लोगों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। ये कीटनाशक खाद्य चीजों के साथ आपकी खाने की थाली में पहुंच जाते हैं और आपके भोजन का हिस्सा बन जाते हैं। जो मानव शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह होते हैं।